सुविधायें और असंतोष ..

जीवन दिन प्रतिदिन सुविधा सम्पन्न हो रहा है और असंतोष बढ़ता जा रहा है,शायद पिछले हजारों सालों मे कीसी भी पीढ़ी ने इतनी सुविधायें ना भोगी होंगी और ना ही सोची होंगी। राजाओं को भी एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाने मे महीनों लग जाया करते थे, आज हमने महीनों का सफर घंटों का […]

सुविधायें और असंतोष ..

लिखूंगा प्रेम भी …

लिखूंगा प्रेम भी लिखूंगा,पहले इन बहती आँखों के,आंसू तो लिख लूँ….जिस ओर देखता हूँ मुझको,बहती आंखे दिख जाती है,चीखें, आहें, रूदन, सिसकी,अब मानवता शर्माती है…

लिखूंगा प्रेम भी …

मैं जानता हूं तुम्हे…

तुम कह सकती हो,तुम क्या समझोगे,पर मैं तुम्हे समझता हूं,मैं तब से तुम्हे,समझता हूं,जब मैं “मैं” बन रहा था…बल्कि मैंने,दुनिया को,तुमको,सबको,सिर्फ तुम्हारी,नजर से,देखा,जाना,समझा,उन नौ महीनों में… मैं तब से जनता हु तुम्हे… फिर जब तुमने,मुझे पहली बारराखी बांधी,मैं तब से जानता हूं तुम्हे… पहली बार जब,जब हम पार्क में मीले थे,उस समय भी डायरी,मेरे हाथों […]

मैं जानता हूं तुम्हे…